कहां जाए कूड़ा

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बीते शुक्रवार की दोपहर दिल्ली के गाजीपुर स्थित कूड़े के पहाड़ में एक विस्फोट सा हुआ और बाकायदा भूस्खलन जैसा दृश्य बनाता हुआ यह एक तरफ से ढह गया। घटना की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कूड़े के पहाड़ का एक हिस्सा पास बहने वाली हिंडन नहर में जा गिरा, जिससे नहर में करीब दस मिनट तक ऊंची-ऊंची लहरें उठती रहीं। कूड़े की चपेट में आकर एक कार और 7 दोपहिया वाहन नहर में जा गिरे, जिससे दो लोगों की जान चली गई और कई घायल हैं। 70 एकड़ में फैला यह कूड़े का पहाड़ पचास मीटर से भी ज्यादा ऊंचा है।
कायदे से इसे वर्ष 2004 में ही बंद हो जाना था, लेकिन सारे लिखित नियमों को धता बताते हुए एमसीडी इसपर लगातार कूड़ा डंप करती रही। शुक्रवार को जब दुघर्टना हो गई तो अधिकारी से लेकर नेता तक इसकी जिम्मेदारी एक-दूसरे के कंधे पर टिकाते नजर आ रहे हैं। कूड़े की समस्या को लेकर नगरपालिका, दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की देखरेख में चलने वाला डीडीए अगर जरा भी गंभीर होते तो पिछले साल ही इस समस्या का कोई हल निकाल लिया गया होता, जब सुप्रीम कोर्ट ने कूड़े के पहाड़ की तुलना कुतुब मीनार से करते हुए जिम्मेदार संस्थाओं से तत्काल इसके निपटारे का उपाय खोजने को कहा था।
लोगों की जान जाने के बाद गाजीपुर में कूड़े की डंपिंग तो बंद हो गई, लेकिन अभी एक नई मुसीबत खासकर पूर्वी दिल्ली के सामने है। दिल्ली में रोजाना करीब 10,050 टन कूड़ा जेनरेट होता है, जिसमें से आधे से भी कम प्रोसेस हो पाता है। बचे कूड़े को लैंडफिल साइट पर डालना होता है। पूर्वी दिल्ली का कूड़ा गाजीपुर के बजाय रानीखेड़ा में डालना तय किया गया, मगर वहां रहने वाले इसके खिलाफ अड़ गए। वैसे भी पूर्वी दिल्ली से 40 किलोमीटर दूर रानीखेड़ा तक कूड़ा पहुंचाना खुद में मुसीबत भरा काम है। एमसीडी ने कुछ और जगहें भी तय की हैं, लेकिन कहीं के भी निवासी अपनी जगह डंपिंग ग्राउंड के लिए देने को तैयार नहीं हैं। आज की तारीख में कूड़ा निस्तारण दिल्ली ही नहीं, भारत के सभी शहरों की एक बड़ी समस्या है। लेकिन स्वच्छता को लेकर जारी लंबी-चौड़ी बातें कूड़े तक पहुंचने से पहले ही हवा हो जाती हैं।

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