वैज्ञानिक शोध में आज भी पिछड़ा क्यों भारत

हमारा भारत आज भी विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में तरक्की का यह रूप जिसमें मोदी जी का स्वागत रोबोट कर रहा है जहाँ रोबोटिक सेना भी उपलब्ध है, उनकी अपेक्षा हमारा भारत आज भी दस वर्ष पीछे है। वैश्विक स्तर पर शोधपत्रों के मामले में भारत अमेरिका और चीन से काफ़ी पिछड़ा है। जहाँ अमेरिका में हर वर्ष भारत के दस गुना ज्यादा और चीन में सात गुना ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित होते हैं और हमारी हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत बस नाम मात्र है।
आजादी के समय इतने संसाधन उपलब्ध न होते हुए भी वेंकटरमन ने देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का झण्डा फहराया जिनको नोबल पुरस्कार मिलना भारत के लिए गर्व की बात थी। तब से हम भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा अर्जित नोबल पर खुशी मनाते हैं। आज जब संसाधनों की कमी नहीं है फिर भी हमारे देश में विज्ञान की स्थिति दयनीय है। हमारी शिक्षा प्रणाली भी देश में आधारभूत विज्ञान विषयों के प्रति रुचि जगाने में नाकाम रही और विज्ञान की पाठ्यक्रम में शामिल एक विषय से  आगे भी समझा नहीं गया। विज्ञान के छात्र प्राइवेट स्कूल में होते हैं तो ठीक है सरकारी स्कूली छात्र तो ट्यूशन पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसी स्थिति में युवा अनुसंधान कार्यक्रमों से जुड़ने के बजाए आई टी क्षेत्र या मैनेजमेंट में अपना भविष्य बनाते हैं। विज्ञान विषयों में पी.एच.डी के बावजूद बेरोजगारी का दंश झेलना पड़ता है। पिछड़े भारत का कारण है कि आजादी के बाद से आजतक देश में ऐसा बुनियादी ढांचा विकसित नहीं किया गया जिससे देश में बड़े पैमाने पर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सके।
आज देश में वैज्ञानिक शोध और अविष्कार का माहौल बनाने के साथ एक ऐसी राष्ट्रीय नीति व उस पर संजीदगी से अमल करने की जरुरत है जिससे हमारा देश इस क्षेत्र में आगे बढ़ सके। इसके लिए भी हमें तीन प्राथमिकताओं पर ध्यान देना होगा। एक – नए वैज्ञानिकों के लिए सम्भावनायें पैदा करके प्रतिभाओं को फिर एक बार इस ओर आकर्षित करना होगा।दूसरी-नोकरशाही की दखलंदाजी को खत्म करके शोध के माहौल को प्रोत्साहन करना, तीसरी-इसके लिए धन के प्रावधान को लगातार बढ़ाना जरूरी है।
                                हिना आज़मी
                           छात्रा बी.ए (मॉस कॉम) 

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