लोककला से संपन्न राज्य उत्तराखण्ड

लोककला से संपन्न राज्य उत्तराखण्ड

जिस प्रकार एक गुलदस्ता रंग-बिरंगे अलग-२,कई प्रकार के फूलों से मिलकर बना होता है वैसे ही विभिन्न धर्मों-संस्कृतियों से हमारा उत्तराखण्ड बना हैlउत्तराखण्ड अपनी भोगौलिक सौंदर्यता में तो अद्भुत है ही साथ ही इसकी संस्कृति और समाज में अनूठा संबंध हैlआज यहाँ,आधुनिक युग में भी हम अपनी संस्कृति व परंपरीओं को भी  निभाते हैंlसब मिल जुलकर त्यौहार मनाते हैंl

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दो पंक्तियां उत्तराखण्ड के लिए-

कई रंगों से मिलकर जैसे बनती रंगोली
उत्तराखण्ड की संस्कृति है
सब मिलकर बनाते हैं दिवाली
और खेलते धूमधाम से होली

उत्तराखण्ड की लोक कला का उदाहरण हमें आज भी पहाडी ह्स्सों में देखने को मिलता है,जहाँ शुभ अवसरों जैसे मुण्डन,जन्मदिवस,विवाह, पूजा आदि में महिलाऐं अपने आंगन व सीढीयों  को ऐंपण से सजाती हैं,गैरू  से लेपती हैl

इसमें चावल को भिगाकर,पीसकर,विभिन्न रंगों में मिलाकर कई डिजाइन बनाऐ जाते हैlजब मशीनों का आविष्कार भी नहीं हुआ था तब हस्तकला से ही हमारे पूर्वजों ने पत्थरों को तराशकर मूर्तियां बनाई यह कला काष्ट कला कहलाईl विभिन्न त्यौहार के अनुरूप विभिन्न हस्त कलाकृतियां बनाई जाती हैं,जैसे हरेला त्यौहार पर मिट्टी के सुंदर-२बने डिकारे शायद ही कहीं देखने को मिलेंl

कृष्ण जी की मुरली की धुन सुनकर ज्स प्रकार गोपियां मनमुग्ध हो जाती थी ऐसा ही है हमारे उत्तराखण्ड के वाध्य यंत्रों  की धुन,जिनमें हुडका,बीन,अलगाजा,नगाडा,ढोल आदि प्रमुखहैlलोकगीत उन्हे कहा जाता है जिन्हे आम जनता द्वारा रचा जाता है जिसका  एक लेखकu6 नही होता है,यह संकलित होते हैंlझोंडा,छपेली,बैर व फाग,न्योली इनके उदाहरण हैंl

साहित्य की नींव लोकसाहित्य हैlहमारे पूर्वज प्राचीनकाल से ही लोकगाथाऐं सुनते थे,गायक गाथाऐं  सुनाते थे,और समाज के सुख-दुख और समाज की स्थितियों से अवगत कराते थेl करूणारस से भरपूर गाथाऐं आज भी हमारे हृदय को करूणा  के सागर में प्लावित कर देती हैl

लोक उक्तियां,मुहावरों से आज हमारे दादा-दादी,हमें सीख देते  रहते हैंl
दोनों संस्कृति कुमाऊं व गढवाल में झुमैलो व  झोडा नृत्य ऐसे हैं जन्हे देखकर दर्शक झूमने लगते  हैंlयह नृत्य बडे-२समूह मे गोले में पुरूष-महिलाऐं हाथ  पकडकर करते हैंlकई नृत्य विश्वव प्रसिद्ध भी हैंlजौनसारी,सर्प नृत्,पाण्डव व जागर की विडियो तो इंटरनेट पर भी विश्व भर केलोग देखते हैंl

फिल्मजगत में भी हमारा  उत्तराखण्ड पीछे नहीं रहाlफिल्मी दुनिया का  उदय ६०-७० के दशक में हुआ परंतुफिल्मी क्रांति १९९०में पराशर गौड के चलचित्र ‘जगवाल’से आई जिसमें रूसे तेरी सौ उत्तराखण्ड आन्दोलन के संघर्ष पर आधारित थीlसन् २००८ में उत्तराखण्ड के सभी कलाकारों,निर्माताओं द्वारा २५वीं गर्षगाठ या सिल्वर जुबली मनाई गईl

आज शादियों में जोग-जानी,बबली तेरौ मोबाइल  जैसे गाने बॉलीवुड से पीछे नही रहेlचाहे हिन्दु-मुस्लिम,चाहे पहाडी हो या देसी सब यह गाने सुनते हैं चाहे अर्थ समझ न आए फिर भी इनके म्युजिक लोकप्रिय हैंlउत्तराखण्ड की गढवाली,जौनसारी,कुमाऊँनी,नेपाली संस्कृतियां मोतीरूपी हैं जो एकता के सूत्र में बंधकर  मालारूपी  उत्तराखण्ड में भाईचारे को बनाती हैl

आज हमारे बडे-बुजुर्ग अपनी संस्कृति को जहां एक ओर आज भी जिंदा रखने की कोशिश में लगे हैं वहीं दूसरी ओर आज की पीढी अपनी संस्कृति को भूलती जा रही हैlआज मंडुवे की रोटी की जगह  पिज्जा ने ले ली है,कुर्ता-पायजामा ने पेंट शर्ट की, तथा घाघरे ने जीन्स की  जगह ले लीlहमें अपनी संस्कृति को संभालकर रखना होगाl

 

   हिना खान

बी ए  मॉस कम्युनिकेशन

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