तेरे कण-कण मै हूँ

तेरे कण-कण मै हूँ
       ईश्वर-एक ऐसी शाक्ति जिस पर हम अटूट विश्वास रखते है जिसे हमने अपने भावों और विचारों से बाहर निकालकर प्रतिमा का रूप देकर उसे पूजते है,उसके सामने अपनी मांगो को रखते है| उम्मीद करते है की वो उन्हें पूरा करे और इसके बदले मे हम उन्हें फल,फूल,प्रसाद,पात्र दान में भेंट चढ़ाकर अपनी मांगो की रसिद कटवाते है| पर क्या कभी हमने सोचा की जिसे कभी देखा नहीं, जिसे कभी सुना नहीं उस पर हम इतना कुछ दे जाते हैं और अगर वही एक भूखा गरीब हमसे कुछ मांग ले तो हम उसे ये कहकर जाने को कहते है की भगवान ने दो हाथ दो पैर अच्छा-ख़ासा शरीर दिया है जाकर कुछ कमाते क्यों नहीं?…..भूखे का कोई धर्म् नहीं, वो हमें मन्दिर-मस्जिद, गुरूद्वारे-गीर्जाघर सब के बाहर मिलेगा | जो हम उसे कहते है वो हम खुद क्यो नहीं करते….दो हाथ दो पैर अच्छा-ख़ासा शरीर तो हमे भी मिला है तो क्यो जाते है उसके दर पर मांगों की रसिद कटवाने| जिसे ढूंढ़ते हम अलग धर्म् के घरो में वो तो हमारे अन्दर ही है , हमारे कण कण में बसा हुआ | मंदिरों में भेंट चढ़ाने की बजाए अगर हम एक भूखे को एक वक़्त का भी पेट भर खाना खिला दे तो मांगे पूरी हो या  ना हो पर दूआ जरूर मिल जायेगी ओर साथ ही एक ऐसा सुकून मिलेगा जो सबसे ऊपर होगा | ईश्वर औऱ शैतान दोनो ही हमारे अंदर है | जब हम किसी के लिए अच्छा करते है तो समझ लीजिये की हमारे कण-कण में जो बसा है वो हमारे अंदर के कभी न खत्म होने वाली मांग रूपी शैतान पर हावी होकर हमे सुकून प्रदान करेगा | ईश्वर और शैतान दोनो ही हर इंसान में बसते है | फ़र्क बस इतना है की हम ईश्वर को शैतान पर हावी होने दे रहे हैं या फिर शैतान को ईश्वर पर |
 छात्रा
मीनाक्षी ठाकुर
 बी.ए मॉस कम्युनिकेशन

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