केजरीवाल के बाद अब सिद्धू के भी पड़ने लगे हैं छित्तर…..

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जनता कह रही है कि हर नेता गलत है, लेकिन कोई ये तो बताओ कि जनसभा में जूते-चप्पल चलाना कोन से शास्त्र में सही लिखा है। अब भारत में चुनाव तो हर दूसरे तीसरे साल होते ही रहते हैं क्योंकि चुनाव है तो जनता है और जनता के आधार पर सभी नेता हैं और अंत में नेता हैं तो भाषण हैं और भाषण हैं तो ही जनसभाएं हैं। इन सब से हट के अब एक नई चीज भारतीय राजनीति में आ गई है जिनको जूते-चप्पल के नाम से जाना जाता है। पहले ये पांवों में पाए जाते थे लेकिन आजकल ये मल्टीटास्किंग हो गए हैं। पांव में होने के अलावा अब जूते-चप्पल राजनीतिज्ञ स्थानों पर भी पाए जाने लगे हैं। पैरों में पाया जाना तो उनका साइड बिजनेस हो गया है। अब तो चुनावी जनसभाओं में तो पब्लिक मुस्कुरा रही है और नेता लोग घबरा रहे हैं कि कहीं से कोई जूता तो नहीं आ रहा। खैर ये सब मजाक तो चलता रहेगा अभी हम असली मुद्दे पर आते हैं।

बात हरियाणा की है, एक तो हरियाणा और ऊपर से रोहतक

हरियाणा में रोहतक नाम का एक शहर है। अब लोकसभा के चुनाव वहां भी होंगे ही और ऊपर लिखी बातों का इस बात से सीधा रिलेशन है, मतलब भाषण वगैरह आप कुछ और तो नहीं सोच रहे ना!
रोहतक से कांग्रेस के दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी चुनाव लड़ रहे हैं जो कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा के बेटे हैं। उन्हीं के लिए प्रचार के लिए नवजोत सिंह सिद्धू ने रोहतक में दस्तक दी थी, लेकिन उन्हें क्याा पता था कि वहां उनके साथ ऐसा होगा। वो अपना भाषण दे ही रहे थे कि वहां खड़ी एक महिला ने उनपर चप्पल चला दी।

लोग भी कितने अजीब हैं, बात का जवाब बात से ही दिया करो यार जूता वूता

   क्यूँ चला देते   हो ?

आखिर उस महिला ने ऐसा क्यों किया ? 

सिद्धू के चप्पल मारने वाली महिला के अपने ही अलग लॉजिक हैं, क्योंकि कारण था सिद्धू से उस महिला की पर्सनल नाराजगी। महिला ने बताया कि सिद्धू जब बीजेपी में थे तो कांग्रेस को गरियाते थे, और अब कांग्रेस में हैं तो बीजेपी की ऐसी-तैसी करते हैं। उधर सोशल मीडिया पर जनता इस घटना की अलग ही मौज ले रही है। सभी लोगों का कहना है कि अगर उस महिला का निशाना ना चूकता तो उसे जेल ना होती। 

अपने इंडिया में भी एक से एक महान लोग बैठे हैं।

खैर कहने वाले तो कहते रहेंगे उनके मन में जो आता है बोल देते हैं और बची-खुची कसर सोशल मीडिया कर देता है। लेकिन सिद्धू ही नहीं किसी पर भी कहीं भी जूता चप्पल क्यों चले भाई ? आप सवाल पूछिए, उसी से बात बनेगी।

भारतीय चुनाव में चल रहे हैं जूते-चप्पल-

हमें लगता है कि विरोध का ये तरीका हिंसक, गैर कानूनी, गैर नैतिक है, क्योंकि कानून को आप अपनी तरफ आकृष्ट कर रहे हैं तो गौर-कानूनी भी कहा जा सकता है। इसलिए एडवाइज तो यही रहेगी कि जूते चप्पलों को पैरों में ही रहने दो यार क्यों उनको मल्टीटास्किंग बना रहे हो।

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