शर्मशार राजनैतिक हत्या…

5 सितंबर 2017 पत्रकारिता जगत में वह काली शाम जब एक वरिष्ठ पत्रकार को घर मे घुसकर गोली मार कर हत्या कर दी गयी।
   गौरी लंकेश जो एक वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ-साथ एक बेबाक़ , निर्भीक आवाज़ थी जिन्हें पिछले दो सालों से लगातार दबाने की कोशिशें की जा रही थी। नक्सलियों के हक के खिलाफ लड़ने वाली जाबाज़ पत्रकार थी जिनकी विचारधारा के अक्सर कई विरोधी हुआ करते थे। विचारधारा में टकराव होने के कारण उन्हें विरोधियों  द्वारा दबाये जाने की कोशिशें स्वाभाविक है लेकिन यह कहाँ का इंसाफ है जहाँ विचार के टकराव का सामना गोली करे।
     यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब किसी पत्रकार को उसके  जनकल्याण कार्य   और विचारधारा के लिए मारा गया हो। राम चन्द्र छत्रपति और न जाने कितने ही पत्रकारों को उनके समाज के प्रति जनकल्याण की निष्ठा के कारण अपने जीवन की बलि चढ़ानी पड़ी। इतना कुछ होने के बाद भी हर हत्या बस पत्रकारिता में एक इतिहास की कहानी बनकर रह जाती है। अब और नहीं आखिर कब तक यूँ कीमत चुकानी होगी। 
        जिस देश में अलग-अलग रंग-रूप जाती के लोग एक साथ वास करते है आज वहीं एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या पर कुछ लोग शोक मनाने की जगह सोशल मीडिया पर ट्वीट के जरिये उन्हें भला बुरा ओर जो हुआ अच्छा हुआ कहकर उनकी हत्या को जायज बताने की कोशिशें कर रहे है। यह वही देश है जहाँ एक ओर मीडिया को कौसा जाता है कि वे अपना काम ठीक से नहीं करते और वहीं दूसरी और जो करते है उनकी हत्या पर शोक की बजाए अपशब्दों का प्रयोग कर रहे है। वाह रे! मेरे देश के लोगों कुछ तो शर्म करो।
मीनाक्षी ठाकुर
मास कॉम
देहरादून

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