गोष्ठियों की असल शुरूवात ही उनके ख़त्म हो जाने के बाद होती है : प्रो लाल बहादुर वर्मा

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गोष्ठियों की असल शुरूवात ही उनके ख़त्म हो जाने के बाद होती है : प्रो लाल बहादुर वर्मा

देहरादून, 23 मार्च शहीद दिवस के मौके पर प्रो हर्ष डोभाल द्वारा ओल्ड ऑर्डर एंड ग्लोबलाइजेशन’ अ ट्रिब्यूट टू भगत सिंह विषय पर प्रो लाल बहादुर वर्मा शिक्षक, प्रख्यात इतिहासविद एवं लेखक के साथ एक वार्ता सत्र एवं विचार गोष्टी का आयोजन डब्लू.आई.सी इंडिया, में किया गया।

वार्ता सत्र में ‘पुराने दौर और वैश्वीकरण’ को लेकर प्रो डोभाल के सवालों के जवाब को प्रो लाल बहादुर वर्मा ने बेहद शालीन और सरल अंदाज़ में वहां मौजूद छात्रों एवं गणमान्य श्रोताओं के समुख किया।

प्रो वर्मा ने वार्तासत्र की शुरुवात भगत सिंह को याद करके की, साथ ही उन्होंने कहा कि भगत सिंह की खूबी थी कि वह अपने ‘दुश्मनों से भी सलाम करवाने की हिम्मत और हौंसला रखते थे’ भगत सिंह के वीर बचपन को भी बस एक ही उदाहरण से पूर्णतः समझा जा सकता कि भरी दोपहरी में उस बच्चे ने बंदूक बोई थी यह वाक्य उस बच्चे की सकारात्मक एवं देशभक्त बुध्दि को दर्षाता है।

भगत सिंह के नाम के साथ शहीद ए आज़म जोड़ना सही नही मानते

प्रो वर्मा कहते है कि देश की स्वतंत्रता के ख़ातिर हर वीर का बलिदान बराबर मायने रखता है इसमें कोई व्यक्तिविशेष नही यह देशहित में लड़ी गयी आजादी की जंग का हिस्सा था जिसमे सबकी सहयोगिता बराबर की थी तो ‘शहीद ए आज़म’ जैसे शब्दों से हमे इन्हें नही बाँटना चाहिए और इनका वर्गीकरण नहीं होना चाहिए।

वार्तासत्र को आगे बढ़ाते हुए प्रो वर्मा कहते है कि दुनियाँ आज भगत सिंह से काफी आगे निकल चुकी है आज की देशभक्ति को सिर्फ़ अपने पड़ोसी देश के प्रति आपके भीतर के गुस्से से मापा जानें लगा है आज देशभक्ति सिर्फ़ एक मानसिक स्तिथि बन कर रह गयी है। आज देशभक्ति का उदाहरण है कि आप अपने पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान, चीन जैसे देशों से नफ़रत करते है तो आप देशभक्त है।

जन्मभूमि और कर्मभूमि का अंतर भी आज समाप्त हो गया है पहले इंसान जहाँ पैदा होता था, उस गाँव, उस शहर को अपनी जन्मभूमि कहता था और देश उसकी कर्मभूमि हुआ करता था लेक़िन आज वैश्विकरण के चलते सब बदल गया है।

आज भगत सिंह जैसा न बचपन देखा जा सकता है ना जवानी आज भगत सिंह जैसे वीर बलिदानी सपूत को भी आतंकवादी जैसे शब्दों से संबोधन सुनने में मिल जाता है जो अंग्रेजी शासन की छोड़ी हुई भेंट है आज युवाओ में आतंकवाद के प्रति काफ़ी रूचि बढ़ती देखी जा रही है और हो भी क्यों न जब आज हमारे आगामी भविष्य के हाथों के खिलौनों का स्वरूप ही बदल गया है।

प्रो वर्मा कहते है कि भगत सिंह प्रेमी जीव था जो मानवता से निस्वार्थ भाव से प्रेम करता था आज यदि हमें समाज मे भगत सिंह को देखना है तो हमे भगत सिंह को एक फेनॉमिना समझना होगा कोई व्यक्ति नही तभी वह भगत सिंह सबके विचारों में जिंदा रहेंगे और विचारों को मारना बेहद मुश्किल है।
भगत सिंह वह व्यक्तित्व रहा है जिसकी न कोई शुरुवात न कोई अन्त।

वार्ता सत्र के अंत मे प्रो वर्मा ने गोष्टी में मौजूद छात्र-छात्राओं के सवालों के भी जवाब दिए साथ ही उन्होंने प्रो डोभाल द्वारा आयोजित इस वार्ता सत्र की सराहना करते हुए ऐसे सकारात्म विषयों पर गोष्टी करने के लिए आभार जताया और ऐसे विषयों पर गोष्ठियों की आवश्यकता को गंभीर माना ताकि हमारी भावी पीढ़ी भी हमारे इतिहास और इतिहास के वीर सपूतों के जीवन से प्रेरणा ले सके। प्रो वर्मा ने अंत मे कहा कि गोष्ठियों की असल शुरूवात ही उनके ख़त्म हो जाने के बाद होती है ऐसी गोष्ठियों से चिंतन मनन गोष्ठियों के ख़त्म होने के बाद ही शुरू होता है।

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