शौचालय के बावजूद भी हालात बदस्तूर

उत्तराखण्ड में कभी गांव को स्वच्छता का प्रतीक माना जाता था। तब गांव में शौचालय नहीं हुआ करते थे और लोग खुले में ही शौच जाते थे, किन्तु गांव में सीमित जनसंख्या थी। अब कहीं गांव खाली हो रहे हैं तो कहीं गांवो में जनसख्या तेजी से बढ रही है। उन दिनों सरकारी सेवा या ठेकेदारी के कामो से जुड़े व्यक्ति के घर-पर ही शौचालय हुआ करते थे जो गिनती मात्र के थे। अलबता राज्य के तराई क्षेत्र में शौचालयों का जो प्रचलन था उसके निस्तारण के लिए जो समुदाय जुड़े हैं उनकी हालात ‘‘स्वच्छ भारत मिशन’’ के बावजूद भी जस की तस बनी है। अर्थात मैला ढोने वाली प्रथा को आज भी आधुनिक नहीं बना पाये। कुलमिलाकर ‘‘स्वच्छ भारत मिशन’’ का सपना मैला ढोने वाली प्रथा के प्रचलन से अधूरा ही है।
अतएव राज्य में स्वजल परियोजना आने के बाद से ही राज्य के गांव व शहरो की बस्तीयों में शौचालय बनने आरम्भ हो गये। राज्य में शहरो की बस्तीयों में बनाये गये शौचलाय तुरन्त उपयोग में लाये गये, मगर गांवो में बनाये गये शौचालयो की उपयोगिता की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। उल्लेखनीय हो कि उत्तरकाशी जनपद में स्वजल परियोजना के अन्तर्गत इस वर्ष शत-प्रतिशत शौचालय निर्माण का लक्ष्य रखा गया था। यह भी तय हुआ था कि कक्षा छः से 12 तक के छात्रों के हाथो में सीटी दी जायेगी जब भी उन्हे कोई खुले में शौच करते दिखाई दिया तो वे तुरन्त सीटी बजा दें। ताकि अमुक नागरिक को शौचलाय बनाने की जरूरत महसूस हो। यह विचार तब उलट हो गया जब उत्तरकाशी के ही जिब्या-कोटधार न्याय पंचायत के आठ गांवो में निर्मित शौचालयों को तोड़ने की खबर सामने आई। हुआ यूं कि इन गावों में उनके ईष्ट देवता नागराजा अवतरित हुए और कहा कि शौचालय अपशुकून का प्रतीक है। ग्रामीण बताते हैं कि 15 वर्ष पहले उनके गांवो में शौचालय बनाये गये थे। उसी दौरान गांव में अतिवृष्टी होने से ग्रामीणो के खेत-खलिहान बुरी तरह से तबाह हो गये। तब ग्रामीण अपने ईष्ट देवता नागराजा के पास गये। देवता ने भी इस आपदा का कारण शौचालय ही बताया है। ग्रामीण भरत सिंह बतातें हैं कि उन्होने अपने घर में बने शौचालय को इसलिए तोड़ डाला कि उन पर भी देवता का दोष चढ गया था। इसी उत्तरकाशी जनपद के ढुईंक गांव में स्वजल परियोजना के तहत शत-प्रतिशत शौचालय बनाये गये। मगर विभागीय जन-जागरण के बाद लोगो के समझ में आया कि शौचालय बर्तन धुलने के लिए नहीं बल्कि शौच के काम आने चाहिए। सो ऐसा ही हुआ तो इसी गांव को वर्ष 2006 में ‘‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’’ भी मिल गया। ऐसी घटनायें अकेले उत्तरकाशी जनपद की नहीं है, राज्य के अन्य जनपदो के दूर-दराज गांवो में इस तरह के अन्धविश्वास अधिकांश लोगो के जेहन में कूट-कूटकर भरे है। क्योंकि इस पहाड़ी राज्य में प्रत्येक गांव का अपना-अपना ग्राम देवता है। जिसके अवतरित होने के पश्चात और देवाज्ञा होने पर ही सामूहिक कार्यो को तरजीह दी जाती है। अर्थात देव आज्ञा के बिना कोई भी सामूहिक कार्य गांवो में सम्पन्न नहीं हो सकता।
दूसरी ओर देखें तो राज्य बनने के बाद से राज्य के छोटे कस्बे बड़े बाजार का रूप ले रहे है और जो बाजार हुआ करते थे वह शहर की शक्ल ले रहे है। यानि की गांव की अपेक्षा अब कस्बा, बाजार, शहरो में शौचालयों का निर्माण स्वःस्फूर्त हो रहा है। जो बची कसर है उसे स्वजल जैसी परियोजना पूरी कर रही है। इस तरह 2012-13 में स्वजल परियोजना द्वारा कराये गये एक सर्वेक्षण में पाया गया कि राज्य में कुल 15 लाख 51 हजार चार सौ 16 परिवार निवास करते हैं। जिनमें मौजूदा समय में 13 लाख 19 हजार दो सौ 40 परिवारो के पास शौचालय हैं। स्वजल परियोजना की राज्य ईकाई का मानना है कि वर्ष 2019 तक राज्य के प्रत्येक परिवार के पास अपना शौचालय होगा। अर्थात 2019 तक दो लाख 30 हजार सात सौ 67 शौचालय बनाने का लक्ष्य स्वजल परियोजना ने तय किया है।
आंकड़ो की बानगी पर गौर करें तो राज्य ‘‘स्वच्छ भारत मिशन’’ का 90 प्रतिशत काम कर चुका है। इसलिए कि राज्य में अब 10 प्रतिशत लोग ही हैं जो खुले में ही शौच जाते है। ताज्जुब तब होता है जब आपको गांव में प्रवेश करते ही गंदगी का प्रकोप सिर चढता है। और यदि आप शहर में है तो सरेआम गंदगी का अंबार पसरा मिलता है। इससे अंदाज लगाया जाता है कि क्या 10 प्रतिशत लोग इतनी गंदगी फैलाते हैं कि जिससे सम्पूर्ण वातावरण दूषित हो रहा हो। सवाल मथ रहा है कि सिर्फ शौचालय बनाने मात्र से ही हम सम्पूर्ण स्वच्छता की कल्पना नहीं कर सकते है। इसके साथ-साथ शौचालयो से रीसने वाले प्रदूषित जल के तरफ भी ध्यान देना होगा, सीवर की व्यवस्थित निकासी की ओर भी काम करना होगा। इसके अलावा पेयजल आपूर्ती से लेकर सामान्य जलापूर्ती के पुख्ता इन्तजाम की अनिवार्यता पर भी कार्य योजना हमारे पास होनी चाहिए।
कुलमिलाकर मौजूदा समय में राज्य के पास ऐसी योजना का अभाव है जो सम्पूर्ण स्वच्छता के लिए एकीकृत विकास के माॅडल पर आगे काम करें। राज्य में विभिन्न पर्यावरण कार्यकर्ताओ से बातचीत की गयी तो वे भी शौचालय को अनिवार्य मानते हुए उसके उपयोग के मानको की बात करते है। वे कहते हैं कि पहाड़ी गांव के लोग आज भी खुले में शौच जाते है, परन्तु उनके गांव के आस-पास गंदगी का नामो निशान तक नहीं होता है। बताते हैं कि गांव में एक तो सफाई की सामूहिक भागीदारी है दूसरा यह कि पहाड़ के गांव के आस-पास जंगल अभी बचे है। शौच इत्यादि के शोधन में वहां पर मौजूद जंगल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह भी देखा गया कि गांव के जिन घरो में शौचालय हैं और उसके आस-पास किसी तरह की गंदगी नजर इसलिए नहीं आती कि उक्त शौचालय के पहरे में सगवाड़ा बना हुआ है। सगवाड़ा जिसे किचन गार्डन कहते है गांव में परम्परागत रूप में सभी के पास है। चाहे उसका घर झोपड़ीनुमा हो या आलीशान भवन क्यों ना हो। किचन गार्डन अर्थात सगवाड़ा गांव में प्रत्येक परिवार के पास परम्परागत रूप से है। इसलिए पर्यावरण के जानकारो का कहना है कि शहरो में कंक्रीट के जंगल खूब फल-फूल रहे है परन्तु पेड़-पौधो को शहरी विकास के नाम पर बली चढाया जा रहा है। इस कारण शहर की आबो-हवा तेजी से दूषित हो रही है। उनका प्रश्न है कि शहर में तो शत-प्रतिशत शौचालय हैं। फिर भी गंदगी का अंबार पसरा रहता है।
दरअसल शौचालय के साथ-साथ सीवर के लिए व्यवस्थित इन्तजाम हो। पेयजल से लेकर अन्य जलापूर्ती नियमित हो। सीवर, कचरा इत्यादि के लिए आधुनिक शोधन तकनीकी का समय पर इस्तेमाल हो। ऐसी व्यवस्था का गांव, कस्बा से लेकर नगर तक में अभाव दिखाई दे रहा है। जबकि हो यह रहा है कि शौचालय हैं तो पानी की समस्या खड़ी हो रखी है। अतएव जल प्रबन्धन का अभाव राज्य में स्पष्ट नजर आ रहा है। सरकार चाहे सम्पूर्ण स्वच्छता का कितना ही नारा लगा ले परन्तु जब तक शौचालय के उपयोग को एकीकृत विकास की नजर से नही देखा गया तब तक स्वच्छ भारत मिशन का सपना अधूरा ही साबित होगा।


क्या है एकीकृत शौचालय विकास


जहां भी शौचालय हो उसके आस-पास किचन गार्डन का होना अनिवार्य रूप से हो। प्रत्येक घर में बरसात के पानी के एकत्रीकरण के लिए टैंक और पतनाले का भी अनिवार्य रूप से निमार्ण हो। कूड़े-कचरे के लिए जैविक और अजैविक दोनो के नष्ट करने के लिए कम्पोष्ट पीट का होना प्रत्येक घर को अनिवार्य कर देना चाहिए। अच्छा हो कि ‘‘ईको साइन ट्वायलेट’’ का उपयोग हो तो यह पर्यावरण के लिए सबसे अधिक मुफिद है।
क्या है ईको साइन ट्वायलेट
ईको साइन ट्वायलेट अघर््यम संस्था बैंगलोर ने इजाद किया है। उत्तराखण्ड, जम्मू-कश्मीर, आसाम, हिमांचल, सिक्किम आदि हिमालय राज्यों में ये शौचालय प्रयोग के तौर पर बनाये गये हैं। इन शौचालयो में पानी की खपत होती ही नहीं है। इन शौचालय के उपयोग में पानी सिर्फ हाथ धुलने के लिए ही चाहिए होता है। शोकपिट में पानी नहीं डालना होता है। पेशाब के लिए अलग से निकासी की व्यवस्था है ताकि पेशाब भी जैविक खाद के लिए उपयोग में लाया जा सके। ये शौचालय 100 फीसदी ईको फ्रेंडली है।  


विडंबना


पहाड़ में जहां-जहां सर्वाधिक शौचालय थे पिछले 2010 से वे गांव प्राकृतिक आपदा के भी उतने ही शिकार हो रहे है। कारण स्पष्ट नजर आ रहा है कि शौचालय के शोकपिट से रिसने वाला पानी गांव की तलहटी को कमजोर कर रहा है, क्योंकि पहाड़ के गांव सीढीनुमा आकार में बसे है। इसलिए शौचालय का शोकपिट कहीं न कहीं अपना रास्ता बनाकर भू-धंसाव को आमन्त्रण दे रहा है। दूसरी ओर शहर में शौचालयों के शोकपिट भू-जल को दूषित कर रहा है। कह सकते हैं कि शौचालय के उपयोग में अब तक कोई ऐसी तकनीकी इजाद नहीं हुई कि शौचालय के शोकपिट से निकलने वाला गंदला जल बाहर आते ही प्रदूषण ना फैलाये। लोगो में एक मात्र समाधान तो सूझा है कि जितनी जरूरत शौचालय की हो रही है उतनी ही जरूरत किचन गार्डन की भी होनी चाहिए। ऐसा विचार स्वजल जैसी योजना के क्रियान्वयन में शौचालय बनाते वक्त अनिवार्य नहीं समझा जा रहा है।

प्रेम पंचोली
(लेखक मान्यताप्राप्त पत्रकार व एनएफआई के फेलो हैं)

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