महिलाओ के प्रति बढ़ती हैवानियत

 




हमारा देश पुरुष प्रधान देश है। लेकिन आज महिलाये पुरूषों से कंधे से कन्धा मिलाकर उनके साथ आगे बढ़ती जा रही है, फिर भी महिलाओ की तुलना में पुरूषों को वरिष्ठ माना जाता है। आज 21वी सदी में भी बेटे होने पर जिस उत्साह के साथ उल्लास मनाया जाता है वह उल्लास बेटी होने पर नहीं दिखायी पड़ता। 16 दिसम्बर 2012 हमारे देश की सबसे दर्दनाक व ऐसी अँधेरी काली रात जिसे शायद ही कोई अभी तक अपने जहन से निकाल पाया हो-निर्भया  रेप केस। जिसमे पीड़िता के साथ न केवल बलात्कार हुआ बल्कि उसके यौन अंगों को बहुत ही बेरहमी के साथ हानि पहुँचायी गयी।  देश की बेटी निर्भया को अभी इंसाफ ठीक से मिला भी नहीं की हमारे सामने एक और ऐसा रेप केस सामने आया है। जिसने हमारी रूह को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है -हरयाणा (सोनीपत) 23 वर्षीय युवती के शादी से इंकार करने पर युवक ने किया उसके साथ कुकर्म। युवती का  अपहरण कर उसके साथ गैंग रेप किया गया और फिर उसके न केवल यौन अंगों को बल्कि आँख, कान, नाक को पूरी तरह ख़राब कर दिया गया ताकि कोई उसे पहचान न सके। भाविष्य में जब भी इन्हें इतिहास के पन्नो में याद किया जायेगा तो एक ही पुकार आएगी-क्या बेटी होना पाप है जो उसके साथ हर साल ऐसी हैवानियत होती गयी और कानून बस तारीके देता गया। लड़कियों से कहा जाता है कि 7 बजे के बाद घर से बहार मत निकलना लेकिन लड़का हो तो जा सकता है। जब एक लड़का जा सकता है तो एक लड़की क्यों नहीं?? लड़का-लड़की होने से पहले हम सब इंसान है जिन्होंने माँ की कोख से ही जन्म लिया है। जब जन्म लेने का स्थान एक है,




फिर एक क्यों नहीं समझा जाता है। न जाने कब तक लड़की के माता-पिता को इस डर के साथ जीना होगा की उनकी बेटी अगर घर वक़्त से नहीं आयी तो न जाने वो कहा होगी उसके साथ कुछ गलत तो नहीं हुआ होगा। हमारे देश में अदालत का मतलब केवल अ-आओ, द-देदो, ल-लेलो, त-तारीख ही रह गया है। बलात्कार करते वक़्त एक किशोर को पता होता है कि वह क्या कर रहा है और कैसे करना है लेकिन सज़ा के वक़्त वह 16 साल का हे तो नाबालिग घोषित करार देकर उसकी सजा कम हो जाती है। वाह रे! देश के कानून क्या खूब नियम बनाये तूने। एक तरफ देश के जवान बॉर्डर पर शहीद होकर हमे देश के दुश्मनों से बचा रहे है तो वही दूसरी तरफ बीमार मानसिकता वाले देश के युवा बलात्कार पर बलात्कार कर रहे। एक लड़की अगर किसी लड़के का प्रस्ताव ठुकराती है तो न जाने लड़को को क्या हो जाता है और लड़कियों पर अपने किशोर होने का घमंड दिखाकर उन्हें बुरी तरह बर्बाद कर देते है। लेकिन बीच सड़क पर किसी लड़की के साथ कोई छेड़छाड़ करे तब इनके अंदर का आदमी कहा जाता है।




बचपन में किताबों में कहावत पढ़ी थी जैसे को तैसा और जैसा बोओगे वैसा काटोगे अर्थात दोनों का ही अर्थ यह हुआ की तुम जैसा करोगे वैसा ही तुम्हारे  साथ होगा। लेकिन बड़े होने पर पता चला की यह सिर्फ कहावत ही थी । हमारे देश का कानून सिर्फ अँधा ही नहीं बल्कि गूंगा, बेहरा, और अपाहिज है। कितनी अजीब बात है लड़की का शोषण होता है और उसे यह साबित भी करना पड़ता है। यही नही साबित हो जाने के बाद भी उसके घरवाले अदालत के चक्कर ही काटते रह जाते है। पहले पीड़िता शारीरिक प्रताड़ना सहती है उसके बाद समाज के द्वारा मानसिक रूप से भी। हाथ जोड़कर विनती है देश के कानून से जो किताबों में कहावते है उन्हें सच कर दीजिए। जिस दर्द से, जिस मानसिक व् शारीरिक उत्पीडन को एक लड़की सेहन करती है ठीक उसी प्रकार मानसिक व् शारीरिक उत्पीड़न सज़ा के तौर पर अपराधियों को भी देनी चाहिए। ताकि अगर कभी किसी के दिमाग में लड़कियों को जरा सा भी हानि पहुचाने का ख्याल भी दिमाग में आये तो उन्हें पहले सज़ा याद आये। वरना वो वक़्त दूर नहीं जब कानून का दरवाज़ा कोई नही खटखायेगा और किताबों को पढ़ना कोई जरुरी नहीं समझेगा।

मिनाक्षी ठाकुर

मॉस कॉम

देहरादून

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