कितने मासूम प्रद्युम्न

0
8

 

अभी तो उसने अपने घोंसले में
आंख ही खोली थी
अभी तो उसकी शक्ल और सोच
दोनो ही भोली थी
काँट दिए पंख जिसने इस नन्हे परिंदे के
काँट दो हाथ पांव ऐसे दरिंदे के
वो तो अभी दुनिया को जान भी नही पाया था
ज्ञान के मंदिर से बस ज्ञान लेने आया था
वो क्या जानता था कि मंदिर में ही शैतान रहता है
जिसको बच्चों को लूटने का भी अरमान रहता है
जो अपनी हवस के लिए बच्चो को चुनता है
सोचो उसकी कितनी छोटी मानसिक्ता है
ऐसी गंदी सोच लेकर पता नही कितने रहते है
जिनको इंसान तो बस कहने को कहते है
एक प्रद्युम्न चला गया दुनिया से
पर ऐसे लाखो मासूम है
जिनको यौन शोषण का
मतलब भी नही मालूम है
कभी डर से कभी लालच में
शैतान इनको लूट जाते है
पर ये बचपन में ही
अंदर से टूट जाते है
कभी घर में डर, कभी पड़ोस के अंजानो से
कभी अपनो से और कभी मेहमानों से
कोई जान खोता है कोई बस रो पाते है
कुछ मासूम इस बात को समझ भी नही पाते है
न जाने कितने प्रद्युम्न इन् दरिंदो की बलि चढ़ जाते है
जो मासूम जान से नही जाते वो आत्मा से मर जाते है

अनुजा मोहन गुप्ता

 

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.