काफ़ी रोगों में लाभदायक है कालमेघ

 

रिपोर्ट आदेश गुप्ता

कालमेघ हमारे जंगलों में बहुतायात में पाये जानेवाला प्रमुख औषधीय पौधा है़ यह पौधा पूरे भारत में पाया जाता है, लेकिन झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्यों में प्रचुर मात्रा में उपलब्धता है़ झारखंड में यह प्राय: सभी जिलों में पाया जाता है़ यह पौधा वर्षा ऋतु में अधिक संख्या में पाया जाता है़ इसका वानस्पतिक नाम एंडोग्रेफिस पैनिकुलाटा है़ संस्कृत में इसे कालमेघ कल्पनाथ, हिंदी व बांग्ला में कालमेघ, तमिल में नीलावेम्बु, संथाल में मुनिम्भ, कालमेघ आदि नामों से जाना जाता है़

</script>इसका पौधा एक से दो फुट ऊंचा, तना चतुष्कोण, नीचे चिकना व ऊपर रोमश होता है़ पत्तियां रेखा कर, दो-तीन इंच लंबी होती है़ं फूल छोटे, श्वेत या हल्के नीले रंग के होते है़ं फल गोल व विक्त होता है़ वर्षा के अंत में शीतकाल तक पुष्प व फल लगते है़ं








बच्चों के पेट के कीड़े को मारने में भी यह उपयोगी है़ इसके लिए इसके पत्तों का रस पांच बूंद, कच्ची हल्दी का रस 30-35 बूंद चीनी में मिला कर प्रयोग में लाया जाता है़ चूंकि यह वार्षिक पौधा है, इसलिए वर्षा ऋतु के अंत में यह शीत ऋतु के आरंभ में इसका संग्रहण कर सुरक्षित भंडारण करना चाहिए। नीलम कुमारी , टेक्निकल ऑफिसर झाम्कोफेड

 

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