अगर हम भी ईश्वर की रचना है तो क्यों हम अलग रहे..?

Opinion Pen : तीन रात अस्पताल में इंतज़ार और असहनीय प्रसव पीड़ा के बाद मेरा जन्म हुआ। मैं अपने ननिहाल में जन्मी और फ़िर जन्मोपरांत जैसे कि सबका ही अमूमन एक सवाल होता है कि क्या हुआ..? जिसका जवाब मेरी माँ के लिए काफी सरल और सुखद एहसास था “लड़की”। पहले ही दिन से माँ की दुलारी लाडली बनी और मेरे जन्म के काफ़ी समय बाद मेरे पिता मुझे और मेरे परिवार को अपने घर ले गए। मेरे घर में मेरा एक बड़ा भाई, भईय्या के साथ पली बढ़ी, खेली कूदी तो मेरा रहन सहन भी लड़को जैसा था। 
माँ और भाई संग खेल कूद, अठखेलियों में समय बीतता गया और फ़िर अचानक एक दिन याद है मुझे वह दिन आज भी जब 16 साल की उम्र में अचानक जैसे मेरी दुनियाँ ही बदल गयी वो बचपन के लड़कपन पे जैसे अकस्मत् विराम ही लग गया।  ऐसा कुछ हुआ जो कि मैं ख़ुद ही किसी को भी बताने का सहस नही जुटा प् रही थी और फ़िर जिसके लिए मैं अपनी माँ के घर लौटने का इंतज़ार करने लगी। माँ आयी तो मैंने बड़ी आतुरता, उत्सुकता और मन में एक अज़ीब डर के भाव के साथ माँ को बताया कि मेरे अंदर से खून आ रहा है। तो फ़िर माँ मुझे खींचती हुई सीधे कमरे के अंदर ले गयी और आराम से बैठकर मुझे  माहवारी के बारे में विस्तार से बताने लगी।
बेटा! ये हर लड़की को होता है। बस अब तुझे अपना ध्यान रखना है ये हर माह होगा।
लेक़िन अब तुझे एक और बात का विशेष ध्यान रखना होगा बेटा जब ये होगा, तो तू मंदिर नही जा सकती, ना भगवान को हाथ लगाएगी, ना किसी व्रत वाले को खाना खिलाएगी  और ना ही किसी को बताएगी कि तुझे क्या हुआ है।
मैंने भी माँ की कहीं बातों को सुनकर हाँ बोला और चली गयी लेकिन काफी दिन तक यही सवाल दिमाग में घूमता रहा कि अगर ये हर लड़की को होता है तो हमे भगवान ने ही ऐसा बनाया है, फिर जिसने हमें ऐसा बनाया हम उनको ही न छुए।
माँ ने बोला किसी को बताना नहीं तो जब मैं मंदिर नही जाऊगी तो सब जान नही जायेगे।
माँ ने बोला तुझे दर्द होगा तो अपना ध्यान रखना , पर कैसे जब मैं किसी को कुछ बता ही नही सकती।
आज तक यही सवाल दिमाग में है।
फिर गाँव के जीवन के बारे में जाना कि जब किसी को माहवारी हो उसको अलग कमरे जो कि घर से दूर है वहा भेज दिया जाता है। माहवारी के दौरान अपनी ही परिवार की स्त्रियों से अछूत सा व्यवहार किया जाता है। 
क्यो करते है ऐसा? 
देश के कई गांव आज भी औरतो को ऐसे मे अकेला छोड़ देते है।
उनको अपनी सफाई और देख रेख के बारे मे कुछ नही पता होता पर वो ये बात किसी को बोल नही सकती क्योंकि शायद उनकी माँ ने भी किसी को बताने को माना किया है।
अगर हम भी ईश्वर की रचना है तो ये भेद भाव क्यों??
क्यों हम खुलके नही बोल सकते?
क्यों आज भी सैनिटरी पैड लेते हुए या तो दुकान पे औरत ढूंढते है या दुकानदार के अकेले होने का इंतज़ार??
अगर हम भी ईश्वर कि रचना है तो क्यों हम अलग रहे?.
हमारे देश के गाँव आज भी स्वच्छता से कोसो दूर है, शहरों में औरतों ने लड़ के या प्यार से इसका हल ढूंढ लिया है, लेक़िन  गाँवो में आज भी औरतें ये भेद भाव सह रही है।

   लेख़/विचार 
अनुजा मोहन गुप्ता 
 

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