आज का आधुनिक युग किस हद तक है महत्वपूर्ण

आज का दौर आधुनिक दौर है जो हमे पूरी दुनियाँ से जोड़ता है| हमारी आम जिंदगी में भी आधुनिकता का प्रचलन बहुत अधिक मात्रा में महत्व निभा रहा है| आज हम सिर्फ़ किताबो तक ही सीमित नहीं रह गए है ज्ञान प्राप्त करने के लिए। आधुनिक माध्यमो की सहायता द्वारा हम जटिल-से-जटिल विषयों को बहुत ही आसानी से समझ सकते है। इस दौर का सबसे बेहतर और अव्वल उदाहरण है “स्मार्ट फ़ोन”।
स्मार्ट फ़ोन में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध होने के कारण हमारी जिंदगी बहुत ही आसान और वक़्त को बचाने वाली हो गयी है। इस सुविधा द्वारा हम किसी भी विषय के बारे में  गहराई  से पलभर में ही जान सकते है। आजकल तो प्राइवेट विद्यालयो में बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ स्मार्ट-क्लासेस भी दि जानें लगी  है। इसका मुख्य कारण है बच्चे पढ़कर कम समझते है और अगर थोड़ा-बहुत समझ कर याद भी कर ल तो जल्द-ही उसे भूल जाते है, वही अगर उन्हें आधुनिक माध्यमो द्वारा किसी भी विषय के बारे मे समझाया जाये तो वे बेहतर समझते है।
    इंटरनेट पढ़ाई के क्षेत्र से लेकर मनोरंजन के क्षेत्र तक अव्व्ल है। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विट्टर, टेलीग्राम, मनोरंजन के क्षेत्र में एक अलग ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। इनके द्वारा हम अपने मिलो दूर बैठे सगे-सम्बन्धियों, दोस्तो से  वीडियो-कॉल द्वारा संपर्क चंद-मिंटो में कर लेते है। लेकिन इसका एक बहुत ही बड़ा दुखदायी सच यह भी है कि  हम, हमसे मीलों दूर बैठे लोगों से तो हम करीब हो जाते है और जो सामने बैठे हमारे अपने है हम  धीरे धीरे उनसे दूरियाँ बढ़ाते जा रहे है। यह कोई नयी बात नहीं है या जिसके बारे मे हम नहीं जानते हो। इस सच से हम सब बहुत अच्छे से वाकिफ़ है। फिर भी हम उन दूरियों को कम करने की बजाए  प्रतिदिन बढ़ाते ही चले जाते है।
     एक माँ को अब अपने बच्चों को देने के लिए वक़्त नहीं चाहें वह बाहर जाकर काम करने वाली महीला हो या फिर घर की कामकाजी महिला, एक पिता शाम को काम से आकर थका  हुआ है अगर उसे अपने बच्चों के साथ खेलना हो या अपनी पत्नी को वक़्त देने की बात हो तो वहीं उनके सोशल ऑनलाइन रहने का वक़्त है। व्हाट्सएप्प व फसेबूक पर दूर के सम्बन्धियों से घंटो चैटिंग करने का वक़्त है। बच्चों के पास भी अपने माता-पिता के साथ वक़्त बिताने का समय नहीं है पर हॉँ दूर बैठे दोस्तो के लिए वह ऑनलाइन सदैव हाज़िर है।
आधुनकि युग का प्रभाव हमारे जीवन मे इस कदर हो रहा है की हम जिंदगी जीने का वास्तविक सुख़ ही खोते जा रहें है और इन्टरनेट की वर्चुअल दुनियाँ में फँसकर लाखों दोस्त तो कमा रहे है पर अपने सामने बैठे अपने परिवारजनों  मानसिक दूरी बढ़ाते जा रहे है।
        अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारी जिंदगी दक्षिण-सभ्यता की तरह हो जायेगी। जहाँ बच्चों को कोई सम्बन्धी पाले, जहाँ रिश्तों के मायने बहुत छोटे होते है, जहाँ पति-पत्नी के रिश्तों के मायने आंतरिक सुख तक ही रहते है, जहाँ न तो दुख को बाँटने वाले मिलते है ना ही सुख को महोत्सव की तरह मनाने वाले। हर चीज़ गूगल पर मिले जरूरी नहीं, कुछ अपनो के पास होने के एहसास से ही सीखी जा सकती है। संस्कार गूगल नहीं सिखाता, खुशी को आप गूगल पर सर्च करके भी नहीं ढूंढ पाओगे। जिंदगी को असली मायनों में सहीं ढंग़ से जीना एक परिवार ही सीखा सकता है ना कि इंटरनेट का गूगल परिवार।

मीनाक्षी ठाकूर
बी.ए  (मास कम्युनिकेशन)

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