“नेकी की दीवार” नेकी कर तो दीवार में रख

नेकी कर तो दीवार में रख’ क्यों कि यही है सच्ची नेकी

नेकी की दीवार

हिमांशु पैन्यूली
प्रेसमिर्ची.कॉम

जी हाँ, सही पढ़ा आपने हमने कोई कहावत ग़लत नही लिखी बस समय के साथ साथ आये कहावत में बदलाव को संशोधित जरूर किया है। “नेकी कर और दरियाँ में डाल” तात्पर्य की ख़ुद के द्वारा किये गये जनहित में काम का बखान नही करना। लेक़िन दौर गुजरा और कहावतों के मायने भी, आज हमें यह कहते हुए बिल्कुल भी संकोच नही हो रहा कि ‘नेकी कर तो दीवार में रख

टिहरी गढ़वाल जिले के चंबा में अपनी दैनिक जरूरतों को जुटाने में असमर्थ जरूरतमंदों की मदद के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘नेकी की दीवार‘ बनाई है।जहां से जरूरतमंद अपनी जरूरतों का सामान जैसे कपड़े इत्यादि बिना किसी संकोच के ले सकते है साथ ही साथ स्थानियाँ लोग वहां पर अपने पुराने उपयोग में लाये सामान, वस्र भी रख रहे है ताक़ि वास्तविक जरूरतमंदों तक यह सामान पहुँच सके।
हालाँकि यह कोई पहली नेकी की दीवार नही है देश और दुनियाँ में ऐसी काफ़ी नेकी की दीवारों के माध्यम से जरूरतमंदों की मदद की जा रही है। अपुष्ट सूत्र और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर इस व्यवस्था की शुरुवात का श्रेय ईरान और चीन को बताया जाता है लेकिन आज यह व्यवस्था भारत देश के विभिन्न शहरों और कस्बों में जरूरतमंदों के लिए काफ़ी व्यापक व्यवस्था साबित हो रही है। गौरतलब है कि यह नेकी की दीवार अब काफी शहरों में देखने को मिल रही है और लोगों में भी इसके प्रति सकारात्मक सोच है वही जरूरतमंदों को भी इस व्यवस्था से लाभ प्राप्त हो रहा है। हल्द्वानी, सिरसा, बाराणसी, अल्लाहाबाद, इंदौर आदि अन्य काफ़ी जगहों पर भी यह व्यवस्था देखने को मिल रही है यदि इस व्यवस्था को इसी प्रकार हर गांव हर शहर,गली मोहल्लों में स्थापित किया जाए तो यह व्यवस्था किसी को भी भीख मांगने का रिवाज़ ही समाप्त कर देगी। ऐसी ही सोच के साथ केंद्र व राज्य सरकार यदि ख़ुद व ग़ैरसरकारी संस्थाओ के साथ मिलकर नेकी की दीवार, मदद की दीवार, जैसी व्यवस्थाओ पर विचार करे और सहयोग करें तो इस से भीख माँगने की परंपरा और भिखारियों का दर दर भटक अपनी जरूरतों के लिए लोगो के छाकले खाने से निजात मिलने में काफ़ी मददगार साबित होगा।

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