बेज़ान होती किताबें

पढ़ना जो कि अच्छी आदत हैं,कहते है कि किताबें हमारे जीवन का सम्पूर्ण आधार है। किताबें हमारी सबसे अच्छी मित्र और खुशहाल जीवन जीने हेतु अनमोल खजाना हैं। हम सभ मनुष्य ही सिर्फ़ विवेकशील प्राणी हैं, हमारी चेतना और विवेक दोनों का ज्ञान अलग-अलग है । पढ़ना  ज्ञान प्राप्ति का साधन हैं।हमारा ज्ञान तभी पूर्ण होगा जब हम सभी अच्छी पुस्तको को पढ़ना  प्रारम्भ करेंगे।
 यदि, हम सभी में अच्छा ज्ञान और सभ्य शिक्षा को प्राप्त करने की ललक को अपने  प्राथमिक शिक्षा के दौरान  ही जगाया जाये, तो हमारी बुद्धि की क्षमता का विकास भी बेहतर ढंग से होगा ।
आज़ के इस आधुनिक दौर में जबकि हर गली, हर नुक्कड़ों में शिक्षण संस्थान, भांति भांति के कोचिंग संस्थानों और और वहीँ  विद्यार्थियों की संख्या में दिनों दिन काफी इज़ाफ़ा होता दिखाई पड़  रहा हैं। किन्तु, आज वास्तविकता में हम सभी किताबों का भोझ उठाने से कतरा रहे है। मुझे लगता है की वर्तमान दौर में  शिक्षा की पद्धति में कहीं ना कहीं कुछ खामियाँ ज़रूर हैं। जो शिक्षा के उद्देश्य को पूरा नहीं करती। आज विद्यार्थियों का लक्ष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ डिग्रीयाँ बटोरने तक सीमित है जिस कारण शिक्षा के स्तर का पतन होता जा रहा है वहीँ शिक्षण संस्थान भी धीर-धीरे ख़ुद को व्यावसायिक ढंग में ढालते दिखायी पड़ते हैं। 
 साथ ही साथ आज के तकनीकी दौर में अमूमन लोगों की सफलता में इंटरनेट का बड़ा योगदान हैं, और हो भी क्यों नहीं, इसके द्वारा विद्यार्थियों को एक तरफ जो फ़ायदा है तो वहीँ इंटरनेट के मायाजाल से नुकसान भी बहुत है। आज इंटरनेट आधुनिकता और नवीनतम उच्च तकनीकी का आविष्कार है। इसके द्वारा हम एक ही जगह पर बैठे-बैठे जानकारियों, सूचनाओं को पढ़ सकते है और किसी भी जानकारी का आदान प्रदान चन्द मिंटो में कर सकते हैं।ये एक विश्वव्यापी मायाजाल है जिसमें लगभग सभी प्रकार की जानकारियाँ हमें अलग-अलग  वेब्साइट में उपलब्ध हो जाती हैं।
आज हम सभी लोग, इस इन्टरनेट के मायाजाल में कुछ इस तरह जकड़ चुके है कि हम आसपास निर्धारित पाठ्यक्रम में सम्मिलित पुस्तको को पढ़ना अब एक प्रकार की चुनौती  बन चुका हैं। आज इलेक्ट्रॉनिक के युग ने आसपास नई-पुरानी, अच्छी-बुरी, किताबों के साम्राज्य की इमारत को ही गिरा दिया है। आज हर कठिन-से-कठिन काम हर मुसीबत का हल “गूगल बाबा” के पास है।

 कभी करीब से पास जाओ
 कुछ कहती है किताबें,
आज बेजान होती जा रही है
  “किताबे” |
  पुस्तकालयों में धूल से
  सनी है “किताबें“||

आज हमारे समाज और संस्कृत के सही निर्माण् के लिए आवश्यक है की हम एक अच्छे  पाठक बने। इसका चुनाव करना मुश्किल होगा, कि  कौन सी किताबें हमारे लिए अच्छी,ओर कौन सी बुरी, क्योंकि-ये भाषा साहित्य समाज, इतिहास,विज्ञान, आदि सभी विषयो को अपने अंदर सँजो के रखे हुए है । इस “गूगल बाबा” ने आज सभी के मानसिक परिश्रम को खत्म कर दिया है। जिसके कारण किताबो की पहचान धूमिल होती जा रही है।            

चलो आज हम सभी
मन की किताबों को खोले,
उससे ज्ञान उजागर करे |
अपने भीतर पड़ने की
अभिरुचि पैदा करे ||

ज्योति बिष्ट
बी.ए (मास कम्युनिकेशन)

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