आधी आबादी के अधिकारों की लड़ाई बदस्तूर ज़ारी

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जब कभी भी महिलाओं के पिछड़ने की चर्चा होती है, तो हमेशा ही पुरुषों को ही दोषी ठहरा कर समाज के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। हाँ कुछ ऐसी बातें सामने आई भी हैं, पर हर जगह और हर बार ये सच नहीं होता है।
पुरुषों पर हर बार ऐसे आरोप लगाने के बाद जब हम गहनता से विचार करते है, तो पाते हैं कि हमारे समाज में कुछ ऐसे अदृश्य ठेकेदार बैठे होते हैं इन सब कारणों के पीछे। वो ठेकेदार जो महिला और पुरुष के बीच में भेदभाव की लकीर खींच कर हर समय अपना मतलब साधने की ताक में रहते हैं। ये हमेशा महिला-पुरुष को एक दुसरे के प्रतिद्वंदी साबित करने की पुरज़ोर कोशिश में लगे रहते हैं। जबकि सार्थक नज़रिया और सार्थक सोंच ये कहती है कि दोनों एक दुसरे के पूरक हैं, सहभागी हैं। जिस तरह एक सफल पुरुष की कामयाबी के पीछे किसी महिला का हाथ होता है ठीक उसी तरह किसी सफल महिला की कामयाबी के पीछे भी किसी न किसी पुरुष की मेहनत, तपस्या और बलिदान जरुर समाहित होता है। हमारे संविधान ने महिला-पुरुष दोनों को समान रूप से अवसरों का, समानता का अधिकार दिया हुआ है। दोनों के समान अधिकारों को लेकर अगर महिला-पुरुष को समान दृष्टि से देखा जाए तो ये बात सोलह आने सच है कि शिक्षा , गुण और क्षमता में दोनों ही बराबर हैं। हम इस बात को बिलकुल भी नकार नहीं रहे क्यों की महिला-पुरुष के भेदभाव को खत्म करने की कोशिशें अब भी लगातार जारी है। लेकिन हकीकत को भी हमें मानना पड़ेगा कि इस अभियान के एक बहुत ही सार्थक और मजबूत कदम उठाना होगा। एक दो नहीं बल्कि हर गाँव से लेकर शहर और फिर पुरे देश में अभियान को चलाना होगा। तब जाकर बनेगा एक समृद्ध और सफल गाँव, एक उन्नत शहर और एक प्रगतिशील देश।
  रेणु  रॉय

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