लटका पड़ा है हरिद्वार बाईपास का चैड़ीकरण कार्य

लटका पड़ा है हरिद्वार बाईपास का चैड़ीकरण कार्य

देहरादून,  पांच किलोमीटर लंबी हरिद्वार बाईपास रोड का चैड़ीकरण कार्य शुरू हुए चार साल का समय बीत चुका है। लेकिन, अभी तक एक किलोमीटर भाग ही चैड़ा किया जा सका है, वह भी कच्चे रूप में। निर्माण कार्य की हीलाहवाली पर ठेकेदार कंपनी अमृत डेवलपर्स से काम वापस छीना जा चुका है। इसके विरोध में उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की रोक पर मामला जहां का तहां अटका है।
ठेका कंपनी ने कोर्ट के समक्ष तीन रिट दायर की थी। जिसमें से दो निस्तारित की जा चुकी हैं। एक में कोर्ट ने कंपनी को जून माह तक काम शुरू करने का अवसर दिया था। यह अवसर कंपनी गंवा चुकी है, मगर तीसरी रिट के अंतरिम निर्णय में कोर्ट ने कहा है कि मामले का निपटारा होने तक नए टेंडर के मुताबिक काम को आगे न बढ़ाया जाए। इसी को लेकर अब लोनिवि ने अर्जेंसी प्रार्थना पत्र दाखिल किया है। लोनिवि के डोईवाला खंड के अधिशासी अभियंता एमएस रावत ने बताया कि कोर्ट को अवगत कराया गया है कि कंपनी ने जून तक भी काम शुरू नहीं किया है और न ही बैंक गारंटी दी है। बाईपास रोड के तीनों हिस्से (हरिद्वार, सहारनपुर व जीएमएस रोड की तरफ) फोर लेन हैं और सिर्फ यही भाग दो लेन हैं। इस कारण लोगों को आवागमन में भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है। ऐसे में प्रकरण का जल्द निस्तारण होना जरूरी है, ताकि काम को आगे बढ़ाया जा सके। कोर्ट में फंसे चैड़ीकरण कार्य पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से दिशा-निर्देश मांगे गए हैं। यहां से मामला विधि मंत्रालय भेजा गया, हालांकि केंद्र सरकार स्तर से भी अभी तक कोई उचित जवाब नहीं मिल पाया। राष्ट्रीय राजमार्ग यूनिट ने चैड़ीकरण कार्य के लिए 13 करोड़ रुपये का इस्टीमेट तैयार कर टेंडर आमंत्रित किए थे। सबसे कम दर वाला 11 करोड़ रुपये का टेंडर रेसकोर्स स्थित अमृत डेवलपर्स का था, जो करीब 18 फीसद कम दर पर था। इतनी कम दर पर यह काम हो सकता है या नहीं, इसके आकलन के लिए तकनीकी समिति के पास भी मामला गया, मगर अधिकारियों ने बिना उचित जांच के ठेके को मंजूरी दे दी। जिसका नतीजा आज बदहाल और ऊबड़-खाबड़ पड़े हाईवे के रूप में जनता भुगत रही है। वहीं, 11 करोड़ रुपये की योजना में सवा दो करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की जा चुकी है, काम का अनुबंध भी निरस्त हो चुका है। यदि अनुबंध बहाल भी होता है तो वर्तमान बाजार भाव के हिसाब से ठेकेदार का गुणवत्तापूर्वक काम कर पाना संभव नजर नहीं आता।

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