वो प्रधानमंत्री, जो कभी संसद में अपने विचार नहीं रख पाए !

Ashutosh mamgain

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में माहौल गड़बड़ हो गया था। 1975 में इंदिरा ने विवादास्पद डिसीजन लिया और इमर्जेंसी लगा दी। इस इमरजैंसी में चैधरी चरण सिंह भी जेल में डाल दिये गये लेकिन जेल में विरोधी पक्ष लामबंद हो गया। फिर जब 1977 में चुनाव हुए तो इस बार इंदिरा बुरी तरह से हारी और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई। उस वक्त ये सोचना भी असंभव लगता था। जनता पार्टी की सरकार बनी जिसमें मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने और चैधरी चरण सिंह इस सरकार में उप-प्रधानमंत्री के साथ-साथ गृहमंत्री भी रहे।                यह खुशी ज्यादा देर नहीं रही, और जनता पार्टी में कलह हो गई। इस कलह से मोरार जी की सरकार गिर गई। बाद में कांग्रेस के ही सपोर्ट से जुलाई 1979 को चरण सिंह प्रधानमंत्री बने और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 20 अगस्त तक का टाइम दिया गया था लेकिन इंदिरा ने 19 अगस्त को ही समर्थन वापस ले लिया। चरण सिंह की सरकार भी गिर गई वो भी संसद का एक दिन सामना किये बगैर ही चरण सिंह को रिजाइन करना पड़ा। कहते हैं कि अगर इस प्रधानमंत्री ने संसद में कुछ बोला होता तो किसानों की कहानी कुछ और होती।
प्रधानमंत्री रहते हुए भी चरण सिंह कोई फैसला नहीं ले पाये थे, लेकिन इसके बाद वित्त मंत्री रहते हुए उन्होने खाद और डीजल के दामों को कंट्रोल किया इसके साथ ही खेती की मशीनों पर टैक्स कम किया। नाबार्ड की स्थापना भी उसी वक्त हुई थी।
किसानों का नेता कहने से चरण सिंह की छवि माडर्न नेताओं की सी नहीं बनती लेकिन चरण सिंह को अंग्रेजी बखूबी आती थी। उन्होंने ‘अबॉलिशन ऑफ जमींदारी’ और ‘इंडियाज पॉवर्टी एण्ड इट्स सोल्यूशंस’ किताबें भी लिखीं और 29 मई 1987 को चरण सिंह का निधन हो गया।


समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव चरण सिंह की ही लीगेसी से आए नेता हैं। चरण सिंह के बेटे अजित सिंह राष्ट्रीय लोक दल पार्टी चला रहें हैं और साथ ही उनके बेटे जयंत चैधरी भी राजनीतिक मैदान में आ गये हैं।

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