सबसे अमीर स्कूल में पढ़ने वाला यह नेता सबसे गरीब स्टूडेंट कैसे ……..

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सन 1978 में भारत का एक 37 साल का डिप्लोमैट इस्लामाबाद के हवाई अड्डे पर उतरा और उसने अपने दोस्त खुर्शीद महमूद कसूरी को फोन लगाया। खुर्शीद ने उसे सलाह दी कि वो इस्लामाबाद से सीधा कराची जाने के बजाए लाहौर होते हुए कराची जाए। डिप्लोमैट एक शर्त पर खुर्शीद की सलाह मानने को तैयार हो गया।


जैसे ही यह डिप्लोमैट लाहौर के हवाई अड्डे से बाहर निकाला, अपने वायदे के मुताबिक खुर्शीद गाड़ी लेकर बाहर खड़े हुए थे। हवाई अड्डे से थोड़ा आगे निकलते ही उस डिप्लोमैट ने अपने शरीर में अजीब सी झुरझुरी महसूस की, गाड़ी आखिरकार एक ऐसे चैराहे पर रुकी जहां निस्बत रोड और मैकलॉयड रोड एक-दूसरे से जुड़ी थीं। दोनों लोग गाड़ी से उतरकर इमारत की तरफ बढे़, जिसकी वजह से इस चैराहे का नाम लक्ष्मी चैक पड़ा था।


डिप्लोमैट ने इमारत में घुसते ही कांपते हाथों से 44 लक्ष्मी मेंशन का दरवाजा खटखटाया, अन्दर से डॉ. मालिक ने दरवाजा खोला तो बाहर खड़े डिप्लोमैट ने उससे सवाल किया, क्या अपने कभी वैद्यनाथ शंकर अय्यर का नाम सुना है?” डॉ. मालिक ने अपनी गर्दन हिला कर तुरन्त मना कर दिया, इसके बाद उस डिप्लोमैट ने खुद का परिचय देते हुए कहा कि मुल्क का बंटवारा होने से पहले यहां वैद्यनाथ शंकर अय्यर रहा करते थे, वे लाला लाजपत राय की ‘लक्ष्मी इंश्यॉरेंस कंपनी’ में सीए हुआ करते थे। मेरा नाम मणि शंकर अय्यर है, मैं उनका बेटा हूं।


10 अप्रैल 1941 के रोज लाहौर के लक्ष्मी मेंशन में पैदा हुए मणि शंकर अय्यर की जिंदगी कम उतार-चढ़ाव भरी नहीं रही। 1947 में देश के बंटवारे के वक्त उनका परिवार दूसरी बार विस्थापित हुआ, पहले विस्थापन की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उनके पिता वैद्यनाथ शंकर अय्यर तमिलनाडु के तंजोर के रहने वाले थे। 1916 में तमिलनाडु में बनी जस्टिस पार्टी अपने शुरुआती दौर में सामंतों, बड़े किसानों और व्यापारियों की गोलबंदी हुआ करती थी। जस्टिस पार्टी के टी.एम. नायर और रामास्वामी पेरियार ने तमिलनाडु में ‘एंटी ब्राह्मण मूवमेंट’ की शुरुआत की, इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य नौकरियों में ब्राह्मणों का एकाधिकार समाप्त करना था। चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई कर चुके वैद्यनाथ उन नौजवानों में से थे, जो इस आंदोलन के चलते नौकरी खोजने में असफल रहे थे। ऐसे हालात में गुस्से से भरे हुए वैद्यनाथ तंजोर के रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ गए, यहां सामने खड़ी पहली गाड़ी पकड़ ली और इस गाड़ी का आखिरी स्टेशन था लाहौर।
वैद्यनाथ को लाहौर में ना तो कोई जानता था और ना ही उन्हें से हिंदी बोलना आता था। फिर उन्हें किसी से सदानंद अयंगार के बारे पता लगा जो कि तंजोर के रहने वाले थे और अयंगार लक्ष्मी इंश्यॉरेंस कंपनी के मैनेजर भी थे । उन्होंने ऐसे वक्त में अय्यर का साथ दिया और उन्हें नौकरी पर रख लिया।
आजादी अय्यर परिवार के लिए किसी त्रासदी की तरह आई दशकों की मेहनत के बाद वैद्यनाथ लाहौर में खुद को जमाने में कामयाब रहे थे। अचानक से उन्हें अपना सबकुछ छोड़कर भारत आना पड़ा, वो दिल्ली आकर अपने लिए नया काम देख ही रहे थे कि 1953 में विमान हादसे में वैद्यनाथ की मौत हो गई। एक बीमा पॉलिसी ने अय्यर परिवार को पूरी तरह बिखरने से बचा लिया। वैद्यनाथ ने अपने नाम पर लंदन की ‘लंकाशायर इंश्यॉरेंस कंपनी’ से तीन लाख का बीमा कराया था। उनके जाने के बाद बीमा की यह रकम उनके परिवार को मिली, जिससे परिवार और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलता रहा।
मणि शंकर अय्यर की मां भाग्यलक्ष्मी अपने पति की मौत के बाद दिल्ली से देहरादून शिफ्ट हो गईं। उस समय मणि शंकर और उनके भाई स्वामीनाथन फेमस दून स्कूल में पढ़ा करते थे, अपनी परिस्थिति का हवाला देने हुए भाग्यलक्ष्मी ने स्कूल से फीस में कटौती की मांग की। भाग्यलक्ष्मी का तर्क था कि उनके देहरादून आने के बाद उनके बच्चे उन्हीं के साथ रहेंगे, ऐसे में उनसे हॉस्टल की फीस नहीं ली जानी चाहिए। स्कूल इसके लिए तैयार नहीं हुआ, इसका आखरी रास्ता यह निकाला गया कि भाग्यलक्ष्मी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दें और इसके बदले उनके बच्चों की फीस का एक हिस्सा माफ कर दिया जाएगा।
मणि शंकर रातों-रात स्कूल के सबसे गरीब छात्र बन गए थ,. वो अपने इस अनुभव के बारे में बताते हैं।
“मैं देश के सबसे रईस स्कूल का सबसे गरीब छात्र था. इस बात ने मेरे दिमाग पर गहरा असर डाला, शायद यही वजह थी कि मैं धीरे-धीरे कम्युनिस्ट होता चला गया।”

दून स्कूल से पढ़ाई करने के बाद मणि शंकर अय्यर दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध सेंट स्टीफन कॉलेज आ गए, यहां उन्होंने इकॉनमिक्स में बी.ए. किया। आगे की पढ़ाई के लिए वो कैंब्रिज के ट्रिनिटी हॉल चले गए। यहां पढ़ाई के दौरान वो पहली बार मार्क्सवादी छात्र आंदोलन के संपर्क में आए। उन्होंने यहां से छात्रसंघ के अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा, लेकिन हार गए। इस चुनाव के प्रचार के दौरान राजीव गांधी ने उनकी काफी मदद की, राजीव दून स्कूल से उनके जूनियर थे, दोनों एक-दूसरे को जानते थे, यह दोस्ती बाद में राजीव की मौत तक जस की तस बनी रही।

मणि 1963 में भारतीय विदेश सेवा में ले लिए गए, इसके बाद उनकी पोस्टिंग कई देशों में रही. 1978 से 1982 के बीच वो पकिस्तान में भारतीय दूतावास में काम करते रहे, 1985 में राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री बने, तो मणि को भारत बुला लिया गया. उन्हें सूचना विभाग में जॉइंट सेक्रेटरी का जिम्मा सौंपा गया, वो चार साल तक इस पद पर रहे, खुद मणि के शब्दों में, इस दौरान उन्होंने राजीव के लिए तकरीबन 1000 भाषण लिखे।
राजीव गांधी मणि शंकर अय्यर के राजनीति में आने के पक्ष में नहीं थे, एक टीवी इंटरव्यू में मणि याद करते हैं।
“राजीव को मेरा राजनीति में आना पसंद नहीं था. उन्होंने मुझे इससे रोकने का प्रयास भी किया. राजीव मुझसे कहा करते थे कि मैं इस सिस्टम के लिए फिट नहीं हूं. आखिरकार मेरे जोर देने पर वो इस बात के लिए राजी हो गए.”
1989 में मणि ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस जॉइन कर ली, 1991 के चुनाव में तमिलनाडु की मयिलादुतुरई लोकसभा सीट से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, मई के तीसरे सप्ताह में राजीव गांधी दक्षिण भारत में चुनाव प्रचार रहे थे, तय कार्यक्रम के मुताबिक उन्हें 22 मई को मयिलादुतुरई में जनसभा को संबोधित करना था।
21 मई को देर रात मणि शंकर अय्यर अपने जनसंपर्क अभियान निपटाकर मयिलादुतुरई लौटे थे, वो अगले दिन की सभा की तैयारी में लगे हुए थे. राजीव गांधी का हेलीकॉप्टर उतरने के लिए हेलिपैड बनाया जा चुका था। शामियाने ताने जा रहे थे, माइक और स्पीकर चेक किए जा रहे थे, अपने दफ्तर में बैठे मणि शंकर सभी तैयारियों का जायजा ले ही रहे थे कि एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने उनके कान में फुसफुसाकर कुछ कहा, उसकी बात सुनते ही मणि शंकर का चेहरा उतर गया. एक टीवी इंटरव्यू में मणि याद करते हैं –

“आधी रात का समय था, मैं अपने संसदीय कार्यालय में बैठा हुआ दिन के आखरी काम निपटा रहा था, तभी एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने आकर मुझे कहा, “राजीव गांधी की श्रीपेरम्बदूर में हत्या कर दी गई है, उसकी बात सुनकर मैं अवाक रह गया. मुझे उसकी बात पर भरोसा ही नहीं हुआ।”
इतना सब होने के बावजूद मणि शंकर अय्यर की छवि एक जहीन आदमी की है। ब्वदमिेेपवदे व िं ेमबनसंत निदकंउंदजंसपेज चंापेजंद चंचमते और त्मउमउइमतपदह तंरपअ जैसी कई किताबों के वो लेखक हैं. उनकी लिखी गईं कुल किताबों का 75 फीसदी हिस्सा राजीव गांधी को समर्पित है, फिलहाल वो उस कांग्रेस से निलंबित हैं, जिसे राजीव के बेटे चला रहे हैं, उनके खुद के शब्दों में राजीव गांधी उनकी सबसे बड़ी सियासी पूंजी हैं, राजीव के शब्दों में ही वो खुद का मूल्यांकन करने हुए कहते हैं –

“राजीव कहा करते थे कि यह सिस्टम मुझे नहीं अपनाएगा, सियासत में लगभग तीन दशक बिताने के बाद मुझे लगता हैं कि इस सिस्टम ने न तो मुझे पूरी तरह से स्वीकार किया और न ही पूरी तरह से रिजेक्ट किया।”

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